बायोकैमिक चिकित्सा पद्धति

बायोकैमिक चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथी की सहायक पद्धति है। जिसमें मात्र बारह दवाइयों से सभी बीमारियों का इलाज किया जाता है।

बायोकैमिक (Biochemic) शब्द बायोस (Bios) तथा कैमिस्ट्री (Chemistry)

शब्दों को मिलकर बना है जिसका अर्थ है-जीवन व रसायन, अतः बायोकैमिस्ट्री का अर्थ है जीवन रसायन। मनुष्य या पशु शरीर असंख्य कोशिकाओं से बना होता है। शरीर के अंदर कार्बनिक (organic) व अकार्बनिक (Inorganic) पदार्थों के मिलने से जो रासायनिक क्रियाएं होती हैं उनसे शरीर का विकास व क्षय निरन्तर होता रहता है और यह सभी कोशिकाओं पर निर्भर होता है। शरीर में विभिन्न अंगों की सुचारू कार्य प्रणाली के लिए विभिन्न प्रकार के अकार्बनिक पदार्थों की जरूरत होती है जबकि कार्बनिक पदार्थ शरीर में ही बनते हैं। यदि शरीर में अकार्बनिक पदार्थों की कमी हो जाए तो कार्बनिक पदार्थ भी काम करने की क्षमता खो देते हैं और शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में हुई इस कमी को पूरा करके शरीर को फिरसे स्वस्थ बनाया जा सकता है। बायोकैमिक सिद्धान्त के अनुसार शरीर में जब तक टिश्यू लवण (tissue salts) उपयुक्त अनुपात व परिणाम में रहते हैं तो शरीर स्वस्थ रहता है। इनके परिमाण में जरा भी गड़बड़ होने पर शरीर रोगी हो जाता है। इस गडबड़ी को टिश्यु लवणों (tissue salts) द्वारा औषधि के रूप में देकर शरीर की चिकित्सा करना ही बायोकैमिक चिकित्सा है। जर्मनी में डॉ. मेड शुसलर ने सन् 1873 में इस चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया। उन्होंने मुर्दो को जलाकर राख की जांच की जिसमें उन्होंने 12 तरह के तत्व (componds) पाएं जिनका नाम साल्ट (salts) रखा। उन्होंने सोचा कि इन्ही बारह तत्वों में से किसी एक की कमी से मनुष्य बीमार हो जाता है और उसी तत्व की कमी को पूरी करने से रोगी स्वस्थ हो जाता है। कई रोगियों की जांच में उन्होंने यह बात सही पायी। यही बायोकेमिक इलाज कहलाता है। उसके बाद धीरे-धीरे यह पद्धति विश्व के कई भागों में फैल गई। आज तो यह पूरे विश्व में खूब प्रचलित है। इस पद्धति से पहले होम्योपैथी के जनक डॉ. हैनिमैन ने जर्मनी में ही अकार्बनिक लवणों का औषधि परिक्षण करके सदृश विधान (Similia Similibus curentur) के अनुरूप चिकित्सा के रूप में व्यवहार किया था। बायोकैमिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार अकार्बनिक लवण जो मनुष्य या पशु के शरीर के हर अंग के विकास, सुरक्षा व स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

ये बारह अकार्बनिक लवण (12 Inorganic Salts) निम्न हैं-

1. कैल्केरिया फ्लोरिका (Calcarea Fluorica)

2. कैल्केरिया फॉस्फोरिका (Calcarea Phosphorica)

3. कैल्केरिया सल्फ्युरिका (Calcarea Sulphurica)

4. फैरम फॉस्फोरिका (Ferrum phosphoricum)

5. काली म्यूरिएटिकम (Kali Muriaticum)

6. काली फॉस्फोरिकम (Kali Phosphoricum)

7. काली सलफ्यूरिकम (Kali Sulphuricum)

8. मैग्नेशिया फॉस्फोरिकम (Magnesia Phosphoricum)

9. नैट्रम म्यूरिएटिकम (Natrum Muriaticum)

10. नैट्रम फॉस्फोरिकम (Natrum Phosphoricum)

11. नैट्रम सल्फ्यूरिकम (Natrum Sulphuricum)

12. साइलीशिया (Silicea)

कैसे बनाई जाती है बायोकैमिक इवाइयां?

बायोकैमिक दवाइयां बनाने के लिए मूल लवण (basic salts) के एक भा को मिल्क शुगर के नौ भाग में मिलाकर साफ खरल में दो घंटे तक रगड़ कर विचूर्ण (trituration) तैयार किया जाता है। इसे 1x पोटेन्सी कहा जाता है। 2x पोटेन्सी बनाने के लिए 1x पोटेन्सी वाली दवा का एक भाग 9 भाग मिल्क शुगर में मिलाकर दो घंटे तक खरल में रगड़ कर तैयार किया जाता है। इसी तरह ज्यादा से ज्यादा शक्ति (potency) की दवा तैयार की जाती है। इस प्रकार जैसे-जैसे दवा की पोटेन्सी बढ़ती है मूल दवा की मात्रा घटती जाती है। दवा बनाने की इस पद्धति को दशमिक (desimal scale) पद्धति कहते हैं। अधिकतर बायोकैमिक दवाइयों को इसी पद्धति से बनाया जाता है। जबकि होम्योपैथी में मूल लवण का एक भाग एल्कोहल के 99 भाग में मिलाकर तैयार किया जाता है। होम्योपैथी में x के स्थान पर C चिन्ह को प्रयोग में लाया जाता है। बायोकैमिक दवाइयां चूर्ण और टेब्लेट के रूप में उपलब्ध होती है। जबकि होम्योपैथी में ये दवाइयां तरल रूप में उपलब्ध होती हैं। सामान्यतौर पर एक ग्रेन की टेब्लेट बाजार में उपलब्ध होती है और एक 50 किलोग्राम के मनुष्य या पशु के लिए एक खुराक में ऐसी चार गोलियां पर्याप्त हैं जो कि शरीर के वजन व उम्र के हिसाब से घटाई व बढाई जा सकती है। यदि दवा पानी में घोलकर देने में मुश्किल हो तो पुड़िया में गोली बनाकर दे सकते हैं।

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