तिल्ली (प्लीहा) के विकार – Diseases of the Spleen

तिल्ली (प्लीहा) के विकार – Diseases of the Spleen

 पेट में बाईं ओर (नाभी के थोड़ा ऊपर की ओर) तिल्ली होती है। बहुत दिन तक बुखार आने से यह बढ़ जाती है और सख्त भी हो जाती है।

 ● तिल्ली के रोगों की मुख्य दवा – (सिएनोथस Q दिन में 3 बार) 

 ● मलेरिया बुखार के बाद तिल्ली के रोग – (नैट्रम म्यूर 6x या 30, दिन में 3 बार) 

 ●  जब बेचैनी हो व अधिक प्यास लगे – (आर्सेनिक एल्ब 30, दिन में 3 बार) 

 ● मलेरिया ज्वर में क्विनिन का अधिक सेवन होने के बाद प्लीहा का बढ़ जाना – (आर्स आयोड 30 या 200, दिन में 2 बार) 

 ● रक्तहीनता, अधिक कमजोरी, यकृत तथा प्लीहा दोनों ही बढ़े हुए हों – (फेरम आर्स 30 या 200, दिन में 3 बार) 

 ● प्लीहा खूब बढ़ी हुई। ज्वर में रोगी को हमेशा ठण्ड लगे, शीत से रोगी मानो जम सा जाता है – (एरेनिया 30 या 200, दिन में 3 बार) 

 ● प्लीहा पर इस औषधि की मुख्य क्रिया है – (एंडरसोनिया Q या 6, दिन में 3 बार) 

 ● ज्वर के साथ प्लीहा का बढ़ना, इतना दर्द कि हाथ भी नहीं लगाया जाता। प्लीहा खूब बड़ी व कड़ी रहती है उस पर हाथ लगाने से उसकी तह कटी-कटी सी मालूम देती है – (यूकेलिप्टस 30 या 200, दिन में 3 बार)

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